वंशीवट की शीतल छैया, सुभग नदी यमुना सी, इतनी आस व्यास की कीजैं, वृन्दाविपिन विलासी, हरि हम कब होंयेंगे ब्रजवासी..
-श्री हरिराम जी व्यास प्राकट्योत्सव विशेष आलेख:) रसिक भक्त श्री हरिराम व्यास जी का प्राकट्य बाल्यकाल में
ही इन्होंने अपने पिता समोखन शुक्ल को गुरूदेव स्वीकार कर लिया। ओरछा राज्य के पुरोहित
पद और उसके वैभव तथा मधुकर शाह का शरणागत् भाव भी उन्हें वृन्दावन रस के प्रति दृढ़
अनुराग से डिगा नहीं सका, बल्कि यह तो नित्य प्रति दृढ़ से दृढ़वत् होता रहा।
हरि हम कब ह्वै है ब्रजवासी! कब मिली हैं वे सखी सहेली हरिवंशी-हरदासी, वंशीवट की शीतल छैया सुभग नदी यमुना सी, इतनी दास व्यास की कीजै, हे वृंदावन विपिन विलासी,
वैष्णव मत् में हरिराम व्यास जी को विशाखासखी का अवतार माना गया है। विशाखाजी युगल केलि में श्रीराधिका जी का अनुगमन करते हुए राधाकृष्ण के मिलन में सहायक होती हैं। इनका स्वभाव, प्रेम, दया, वात्सल्य और सहज अनुराग से परिपूर्ण है। व्यासजी के चरित्र में इन्हीं गुणों का गायन प्रतीत होता है। इनका वृंदावनीय अनुराग और अभेद दृष्टि इसका पुष्ट प्रमाण है। उनका भक्ति सिद्धांत माधुर्य रस से आप्लावित है, जो भक्ति तत्व के चरमोत्कर्ष का विवेचन करता है
राधाकृष्ण, वृंदावन और सखी परिकर का प्रतिपाद्य ही व्यास वाणी है। वृंदावन रस, राधाकृष्ण तत्व का आश्रय और सखी समुदाय का संग ही प्रेमलक्षणा भक्ति है। अनन्य रसिक भाव से वृंदावनीय निकुंजों से आच्छादित किशोरवन में इन्होंने अपने आराध्य युगलकिशोर को प्रकट कर दिया। रसिक अनन्य हमारी जाति!कुलदेवी राधा बरसानौ, खैरो ब्रजवासिन सों पाति!! जिस सहज प्रेम का भाव-प्रभाव रसिकों में दृष्टिगोचर होता है, वैसा अन्यत्र मिलना सहज नहीं। नाभादास कृत भक्तमाल से प्रमाण मिलता है कि भक्ति और कर्म में इन्हें भक्ति ही श्रेय थी।
व्यासजी रासलीला में विशाखा सखी के भाव में निमग्न रहते हुए सदैव उद्यत रहते थे। एक बार शरद पूर्णिमा की रजत ज्योत्सना में नृत्य करते हुए श्रीराधा जू का नूपुरबंधन खुल गया। रासलीला में बाधा जानते हुए व्यासजी ने अपने जनेऊजी की सार्थकता जानकर तुरंत नूपुर को गूंथ दिया और कहने लगे ‘जनेऊ का भार हमने जन्मभर ढ़ोया, पर आज काम आया’ ऐसी थी उनकी कर्म पर भक्ति की प्रधानता। व्यासजी नियमतः गोविंददेव जी के दर्शन कर राजभोग पाते थे। एक दिन उन्हें और महाप्रसाद प्राप्त नहीं हो सका, तो शोक संतप्त हो गए।
करूणावरूणालय गोविंददेव जी ने अपने भक्त की संकल्पपूर्ति के लिए एक शूद्र स्त्री को इनके समक्ष भेज दिया, जिसके सिर पर रखी डलिया में महाप्रसाद था। इस कृपा को आत्मसात् करते हुए व्यासजी ने तुरंत ही उसकी डलिया से एक पकौड़ी शिरोधार्य कर पा ली। इसके बाद व्यासजी यमुना तट पर रसिक समाज में पधारे। जहां इनके शिष्य मधुकर शाह दर्शनार्थ आए हुए थे। सत्संग में महाप्रसाद का प्रसंग ही छिड़ गया। कर्मकांडियों के विस्मय पर मधुरशाह ने उन्हें मर्मविमुख कहा, तो मंदस्मित भाव से व्यासजी बोले व्यासहि ब्राह्मण मति गनौं हरिभक्तन कौं दास! वृंदावन के स्वपच की जूठनि खहिये मांगि!! व्यासजी का चरित्र और वाणी हर रूप में हमें भक्ति, अभेद और ईश्वर की सत्ता के प्रति भाव परायण होने की प्रेरणा देती है।
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